यह मिथक सुविख्यात है. कि दक्ष-यज्ञ में शंकर के अपमान से मर्माहत सती ने आत्मदाह कर लिया था शोकाकुल महादेव विक्षुप्त हो गये. सती के शव को कंधो पर लिए उन्होने रूद्ररूप में तांडव शुरु कर दिया था. सृष्टी को अवश्यम्भावी विनाश से बचाने के लिए तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती का अंग भंग किया था. सती की दिव्य देह के विविध अंग अलग-अलग क्षेत्रों में जा गिरे थे. जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्ति पीठ बन गये. भारत में ऐसे शक्ति पीठों की कुल संख्या 52 मानी गयी है | शक्ति पीठ लोक वन्दित उर्जा के केंद्र है. सदा नीरा कोशी के पुण्य तट पर अवस्थित पुण्य भूमि पर सती का दाहिना हाथ गिरा. यह हाथ अपने साथ अपार उर्जा और वरदान लेकर गिरा.
कात्यायनी शक्ति पीठ अनेक कारणों से सभी शक्तिपीठों में अद्वितीय है. भगवती कात्यायनी चौथम राज की कुल देवी है. लोकास्था, लोकगीत (अहिरायन) में विद्यमान इस सत्य का उल्लेख करना जरुरी है कि चौथम के राजा मंगल सिंह (मुरार साह) की मित्र श्रीपत महाराज के पास शताब्दिक गायें थी. जिनमें से एक गाय एक खास स्थान पर खड़ी होकर प्रतिदिन अपने थन से दुध गिराती थी. जब इस चमत्कार की जानकारी राजा मंगल सिंह को मिली तब उनके आदेश से उस स्थान की खुदाई की गई. जिसमें कात्यायनी माता का पिंड (दाहिना हाथ) मिला. राजा ने 1595 ई० के आस-पास वहाँ उस पिण्ड की खोज कर मंदिर का निर्माण कराया. (भिट का मंदिर) इस ऐतिहासिक सत्य का उल्लेख ब्रिटिश सरकार मुंगेर जिला गजिएटियर 1926 में है. इसी वंश में तत्कालीन राजा सुरेन्द्र नारायण सिंह के द्वारा मंदिर के आस-पास की जमीन उन्होनें दान में दिया. वे चौथम राज के अंतिम शासक थे.
माँ कात्यायनी शक्तिपीठ ५२ शक्तिपीठों में से एक है | इस शक्तिपीठ में माँ का दाहिना हाथ गिरा था | माँ कात्यायनी के लोक गीत (अहरण)में विददमान सत्य उल्ल्लेखित है चौथम राज के राजा मंगल सिंह और श्रीपंथ महाराज दोनों मित्र थे और माता कात्यायनी नें इन्ही दो व्यक्तियों को स्वपन में दर्शन देकर अपने अस्तित्व का ज्ञान दिया था | कहा जाता है की माँ , कात्यायान ऋषि के पुत्री के रूप जन्म लेकर कात्यायनी कहलाई देवी पुराण में दुर्गा के जिन नौ रूपो का वर्णन किया गया है उसमे दुर्गा का छठा रूप माँ कात्यायनी का है |
माँ कात्यायनी शक्तिपीठ में जितने भी भक्त जन अपनी मनोकामनाए लेकर आते है उनकी मनोकामनाए पूर्ण होती है | माँ कात्यायनी शक्तिपीठ में अन्य शक्तिपीठो के पूजन परम्पराओ से अलग पान पूजा की परम्परा है जो अन्य शक्तिपीठो में देखने को नहीं मिलती है | माँ कात्यायनी शक्तिपीठ पशु पालक भक्त जनों के लिए भारत का सबसे प्रमुख तीर्थ स्थल है यहाँ दुधारू पशु के नए बच्चो को जन्म देने के उपरांत सर्व प्रथम माँ के चरणों में चढ़ाया जाता है किसी भी दुधारू पशु के बीमार परने पर के दरबार में पूजन के पश्चात उस बीमार दुधारू पशु की बीमारी ठीक हो जाती है | इस मनोकामना के उपरान्त अन्य मन्नतों के पान पूजन होने पर श्रद्धालु के द्वारा वही पूजा एवं खीर का भोजन कराया जाता है | सोमवार एवं शुक्रवार को माँ की विशेष पूजन का महत्त्व है |